Saturday, September 14, 2013

कुछ मुक्तक कुछ शेर {भाग सात(VII)}


अरुण कुमार तिवारी 





21.दुशमन भी बहुत,आशायें भी बहुत,
    सामने समर भयंकर है,आगे राह कठिन होगी।
    ध्रिड संकल्प लिए चलना,
    निश्चित ही तेरी विजय होगी।।


1 .जिंदा हो सो जगा रहाँ हूँ तुम्हे,परेशां हो तो बस एक बार।
   अपने मरने का सबूत दे देना नहीं आऊंगा फिर जगाने के लिए।।

2 .दीवारे मज्जिद पर लिखा था "काफ़िर का आना बंद है"।
    और फिर खुदा अपना रास्ता बदल के चला गया यारों।।

3 .बहुत दिन तक नहीं चलेगी सियासत जान लो मौलवी।
    कभी तो टोपियों के नीचे दिमाग तिलमिला के जाग जायेगा।।

4 .रोटी रोटी को तरस रहा आदमी,रोटी रोटी को फैंके हुए आदमी।।
    जिन्दा है फिर भी मर चूका आदमी,मरके भी तो जिंदा रहा आदमी।।

5 .कभी गर्म हवाओं ने रोका,कभी शर्द फ़िज़ाओं ने रोका।
    हार गए जब ये सब तो,फिर तेरी निगाहों ने रोका।।

6 .मौत के डर से सर बचाने की वो कीमत अदा करनी पड़ी।
    हर गली,हर मोड़,हर राह,हर दर्र पे सर झुकाना पड़ा है यारों।।

7 .फिर खो गए अरमान मेरे मेरी ही परछाईयों में।
    फिर ढूँढने निकला हूँ खुद को खुद के वजूद में ।।

8 .खुद को देखा नहीं महसूस किया जाता है।
    मै को मै  आज़ाद किया जाता है।। 

9 .हर एक सर की कुछ न कुछ कीमत लगाई थी उसने।
    इस तरह से दुश्मनों की वफादारी पाई थी उसने।।

10.जहान में जब कभी भी दर्द बयाँ करता है दर्द को। 
     दर्द फिर खुद दर्द की कहानी बयां कर देता है यारों ।।

11.एक दो दिन की बात नहीं उम्र गुज़र जाती है। 
     मकान को घर,आदमी को इंसान बनाने में।।

12.तुरक न छोड़े तुरकई,हिन्दू छोड़ चुका अपनी पहचान । 
     बहुत दिनों की बात नहीं,जब मिटेगा तेरा नामोंनिशान।।

13.आपका व्यव्हार गवाही देता है,आपके आम आदमी होने की।
     टोपियाँ पहन के,हुलिया बदल के कोई आम आदमी नहीं बनता।।

14.बेहूदा बातें घूमती रहती हैं बाज़ारों में। 
     अच्छी बातों के कदरदान नहीं मिलते बाज़ारों में।।

15.मांगता रहा ताउम्र वो औरों के लिए ही यारों।
     उसका दिल देखो कटोरा न देखो उसका यारों।।

16.कुछ तो बदला है ज़माने की रुसवाइयों ने। 
     मै लिखता कुछ और हूँ तू समझता कुछ और है।।

17.ये जिंदगी है,कोई खेल नहीं बस इतना जान लो यारों।
     हर मंजिल बस एक पड़ाव है दूसरी मंजिल का यहाँ पर।।

18.न पूँछ मुझसे दर्द छालों में है कितना।
     मंज़िल पे पहुँच के छाले आवाज़ नहीं करते।।

19.एक अनजानी अनदेखी ख़ुशी की तलाश में। 
     तमाम उम्र काट दी एक अजनबी की तलाश में।।

20.अपने संस्कारों से हटने की कीमत चुकाने लगे हैं लोग।
     जिल्द से किताब,चेहरे से इंसान की पहचान बताने लगे हैं लोग।।


धन्यवाद,
अरुण कुमार तिवारी 

Thursday, September 12, 2013

No values or culture can remain alive unless it is not in practice


No values or culture can remain alive unless it is not in practice.
:Chanakya










The reason for YOUR destruction/demise is YOURSELF.
The reason for OUR destruction/demise is OURSELF.

No values or culture can remain alive unless it is not in practice.

These are liars – the ones who say the reason for loss/destruction of their faith is due to the growth/raise of other faiths/cultures. Faith was yours, how can it be destroyed? And if your faith doesn’t have the support of TRUTH then it SHOULD FAIL.

Your path could be different, his path could be different – there can be many paths to reach the TRUTH. Thus it is incorrect to assume that those who are not on my path are on incorrect path.

“Ekam sat viprah bahuda vadanti” (hymn from the Rig Veda I.164.46)
One truth is told/expressed by the learned in many ways. Faiths/Traditions/Cultures can be paths, but NOT GOAL.

In between the practitioner (one who treads the path of spirituality) & practiced lies Sadhana (a means of accomplishing something or more specifically spiritual practice).

Sadhana is a path too. This can be different too. The followers of the same (single) culture can have different sadhana(s). So due to difference in Sadhana or by difference in traditions our cultures cannot be different.

Culture is the TRUE value of LIFE. Life has a principle/law/rule of which we are all followers. We have faith in Life, this is our belief (our faith), this is our culture. The one which has (is) deviated from TRUTH, that is not acceptable to us, this is our principle, this is our Law. And it is this culture which gives us different paths to get to the Lord.

There is no conflict between one path and another path as long as they are with the TRUTH. So, if somebody is on a different path from you – do not worry, do not be disturbed – keep your faith, respect your values and periodically assess them.

In the light of TRUTH see and examine your traditions and culture. As long as you protect the TRUTH, Culture will protect you – this is a simple aspect which can easily be understood.

Today, if you are feeling insecure – the reason is not external – it is within. When you leave the path of TRUTH which other way do you leave for yourself (is there an option for yourself?)? This is the reason for your destruction/demise and this is the reason for the destruction of the society.

Instead of accepting the challenge – you ingrain hatred, challenge others. If you have immense faith in the path and values of TRUTH – then show that by living it. Your action can be your history and you have a right to make your history.


If you are capable show that in action, show that in your life, provide examples, be an example – who has stopped you? TELL….. GO AHEAD….

Saturday, August 31, 2013

क्या पता




ये दौर जिंदगी में फिर आये न आये;
क्या पता।  
ये लम्हा जो है ख़ुशी का फिर आये न आये,
क्या पता।।

आंसूं भी गर बहे तो बहे गैरों के दर्द पर।
मरने के बाद कब्र पर मेरी कोई दो आंसूं बहाए न बहाए 
क्या पता।।

सब को मिल जायें दोनों जहाँ की खुशियां।
मुझको फलक के तारे मिलें न मिलें 
क्या पता।।

तुम बनके सूरज चमकना जहान में।
मेरे नसीब में दिए की भी रौशनी आये न आये 
क्या पता।।

तुम पूरा करके सफ़र पहुँच जाओ अपनी मंज़िल पे।
मेरी टूटी नैया को साहिल मिले न मिले 
क्या पता।।

आज तनहा हूँ तो शायद ये कह पाया हूँ।
दिल में फिर कुछ कहने की आरज़ू आये न आये 
क्या पता।।

दर्द आज गीत बनके निकलना चाहता है जहान में।
अब कंठ मेरा साथ दे न दे 
क्या पता।।

आज जाम नहीं उठा रहा हूँ,तेरी कसम याद है ।
अब कल कोई कसम याद रहे न रहे 
क्या पता।।

तुम ढूंड लेना मुझसे अच्छा साथी कोई ।
मेरी सांसों की डोर अब रहे न रहे  
क्या पता।।

धन्यवाद,
अरुण कुमार तिवारी 

Friday, August 23, 2013

भूँखी माँ की गोद में मरता वो भूँखा बच्चा


(अरुण कुमार तिवारी )











राह पर पड़ा मुर्दा हमको,
ये बता गया ।
आज शरीफ आदमी की 
किस्मत राहू खा गया।।
हर ताकतवर आदमी अपनी गलती का बोझ,
कमज़ोर को थम्हा गया।
डॉक्टर बेटा अनपढ़ बाप को
बाप कहने से कतरा गया।। 


आज शरीफ आदमी की, किस्मत राहू खा गया।।

वो गरीब कुत्ता आज फिर,
राह चलने से घबरा गया।
एक शरीफ कुत्ता था जो कल,
किसी सेठ की मोटर के नीचे आ गया।।
अब शरीफों की बिल्लियाँ भी,
अकेली राह पे नहीं चलतीं।
क्या होगा अगर किसी रईस के कुत्ते का ,
दिल उसपे आ गया।।

आज शरीफ आदमी की, किस्मत राहू खा गया।।

मासूम खरगोश को इक,
भेडिया फिर बहका गया।
दावा के नाम पर एक,
छोटी सी पुडिया पकड़ा गया ।।
वो  पुडिया थी अ जादू 
बाप का सर अस्पताल की चौखट पर टिका गया।।

आज शरीफ आदमी की, किस्मत राहू खा गया।।

गले में किसी नेता का पट्टा लगाये,
जंगले में एक सियार आ गया ।
भोले जानवर तो जानवर शेर की भी
बोलती बंद कव गया।।
चालक लोमड़ी का पति ही अपने को,
उसके सहारे राजा बनवा गया ।।

आज शरीफ आदमी की, किस्मत राहू खा गया।।

सभ्यता के नाम पर, 
असभ्य बनने वालों, 
सत्ता में आने के लिए हर, 
नाज़ायज़ कोसिस करने वालों,
मंत्री की कुर्सी के लिए, 
खून तक बहाने वालों,
भूँखी माँ की गोद में मरता वो भूँखा बच्चा,
आज क्यूँ नहीं तुम्हारी नज़रों 
के सामने आ गया ।।

आज शरीफ आदमी की, किस्मत राहू खा गया।।


धन्यवाद,
अरुण कुमार तिवारी 
    

Tuesday, August 20, 2013

Atma shatkam / Nirvana Shatkam


आत्मषट्कम् / निर्वाणषट्कम्

Atma shatkam / Nirvana Shatkam

"Nirvana" is complete equanimity, peace, tranquility, freedom and joy. "Atma" is the True Self.




मनोबुद्धयहंकार चित्तानि नाहं,
न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
 न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः,
 चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।। 

Mano Buddhi Ahankara Chitta Ninaham
Nacha Shrotra Jihve Na Cha Ghrana Netre
Nacha Vyoma Bhoomir Na Tejo Na Vayu
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham


मै  न तो मन हूँ ,न अहंकार ,न ही चित्त  हूँ
मै  न तो कान हूँ ,न जीभ ,न नासिका ,न ही नेत्र  हूँ
मै  न तो आकाश हूँ ,न धरती ,न अग्नि  ,न ही वायु  हूँ 
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ 

I am not mind, nor intellect, nor ego, 
nor the reflections of inner self.
I am not the five senses, beyond that I am.
I am not the five elements: neither ether, 
nor earth, wind, or fire. 
I am indeed That eternal knowing and bliss, 
eternal love, pure consciousness.
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न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः, 
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः । 
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।


Na Cha Prana Samjno Na Vai Pancha Vayu
Na Va Saptadhatur Na Va Pancha Koshah
Na Vak Pani Padau Na Chopastha Payu
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham

मैं न प्राण चेतना हूँ ,न ही शरीर को चलने वाली पञ्च वायु 
मैं न शरीर का निर्माण करने वाला सात धातु हूँ ,न ही शरीर की पञ्च कोशिकाए 
मै  न तो वाणी हूँ ,न हाँथ ,न पैर ,न ही विसर्जन की इन्द्रिया हूँ 
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ 


Neither can I be named as energy alone,
nor the five types of breath, 
nor the seven material essences,
nor the five coverings.
Neither am I the five instruments of elimination,
procreation, motion, grasping, or speaking.
I am indeed That eternal knowing and bliss
unchanging love, one consciousness.
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न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।

Na Me Dvesha Ragau Na Me Lobha Mohau

Mado Naiva Me Naiva Matsarya Bhavah
Na Dharmo Na Chartho Na Kamo Na Mokshah
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham


न मुझे किसी से वैर है.न किसी से प्रेम,न मुझे लोभ है, न मोह है
न मुझे अभिमान है,न इर्षा है
मै धर्म ,धन,लालसा एव मोक्श से परे हूँ  
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ 

I have no hatred or dislike, 
nor affiliation or liking, 
nor greed,nor delusion, 
nor pride or haughtiness, 
nor feelings of envy or jealousy. 
I have no care, nor any wealth,
nor any desire I am, 
nor even liberation. 
I am indeed That eternal knowing and bliss,
boundless love, pure awareness.
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न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं,
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।


Na Punyam Na Papam Na Saukhyam Na Dukham
Na Mantro Na Teertham Na Vedo Na Yajnaha
Aham Bhojanam Naiva Bhojyam Na Bhokta
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham

मैं पुण्य,पाप,सुख और दुःख से विलग हूँ
न मैं मंत्र,न तीर्थ,न ज्ञान,न ही यज्ञ हूँ
न मैं भोजन,न ही भोगने योग्य और न ही भोक्ता हूँ
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ 

I have neither merit, nor demerit
I am not bound by sins or good deeds,
nor by happiness or sorrow,
not pain or pleasure.
I am free from mantras, holy places,
scriptures, rituals or sacrifices.
I am none of the triad of
observer, act of observing or the object itself.
I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva,
pure love, flawless consciousness.
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न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः,
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।। 

Na Me Mrityu Shanka Na Me Jati Bhedah
Pita Naiva Me Naiva Mata Na Janma
Na Bandhur Na Mitram Gurur Naiva Shishyah
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham


न मुझे मृत्यु का डर है,न जाती का भय 
मेरा न कोई पिता है न माता है,न ही कभी मै जन्मा था 
मेरा न कोई भाई है ,न मित्र ,न गुरु ,न शिष्य 
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ  



No fear of death I have,
I have no separation from my true self, 
no doubt about my existence, 
nor have I discrimination on the basis of birth.
I have no father or mother, nor did I have a birth. 
I am not the relative, nor the friend, 
nor the guru, nor the disciple. 
I am indeed, That eternal knowing and bliss, 
immaculate love, fully awake.
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अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
 न चासङत नैव मुक्तिर्न मेयः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।। 

Aham Nirvikalpo Nirakara Roopaha
Vibhutvacha sarvatra sarveṃdriyaṇaṃ
Na chasangata naiva muktir na meyaḥ
Chidananda Rupa Shivoham Shivoham

मैं निर्विकल्प हूँ ,निराकार हूँ 
मैं विचार विमुक्त हूँ  और सर्व इन्द्रियों से पृथक हूँ 
मैं न कल्पनीय हूँ ,न आसक्ति हूँ,और न ही मुक्ति हूँ 
मै तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ ,अनादी ,अनंत हूँ ,अमर हूँ  

I am all embracing,
without any attributes, without any form.
I have neither attachment to the world,
nor to liberation.
I have no wishes for anything
because I am everything,
everywhere, every time,
always in equilibrium.
I am indeed, That eternal knowing and bliss,
That unfathomable grace.



 ॐ नमः शिवाय 

धन्यवाद 
अरुण कुमार तिवारी 

Friday, August 16, 2013

कुछ मुक्तक कुछ शेर {भाग छः (VI)}



कुछ मुक्तक कुछ शेर {भाग छः (VI)}
अरुण कुमार तिवारी 






25. मौत वही जिसका दुनिया करे अफ़सोस।
      यूँ तो ज़माने में मरते हैं सभी लोग।।

1.  कभी अपनों के लिए कभी गैरों के लिए मरा हूँ मैं।
     दुनिया में दुनिया को इस कदर जिया हूँ मैं।।

2.  ढूँडोगे तो हर बात में राज़ नज़र आएगा।
     चाँद तो चाँद सूरज में भी दाग नज़र आएगा।।

3.  हम तो दिल के उफनते तूफ़ान लिखा करते हैं।
     लोग कहते हैं,आपनी मौत का सामन लिखा करते हैं।।

4.  ज़िन्दगी भर समझते रहे लोग जिन्हें चट्टान,उनके जाने के बाद जाना ये।
     कठोर से कठोर चट्टान के बीच निर्मल जल स्त्रोत निकलते हैं।।

5.  जो करते हैं आज उनकी पूजा,
     तस्वीर भी अपने कमरों में सजाये हैं।
     यही वो लोग थे ज़माने में,
     जिन्ही कभी वक्त भी न था उनसे मिलने का।।

6.  हुस्न तेरा देख के ख्वाब हमारे चल दिए।
     तुझे देख के लोग तो लोग चाँद तारे चल दिए।।

7.  आधी अधूरी सी नज़्म,मगर पूरी सी नज़र आती है।
     तेरी नजदीकियां मुझे अब,दूरी सी नज़र आती हैं।।

8.  कभी रहते थे हम जहाँ,तेरे सीने में वो दिल ही न रहा।
     आनी थी जहाँ बहार,वो गुलशन ही न खिला ।।

9.  चंद आंसू ही तो हैं,बह जाने दो।
     वफ़ा की खातिर,इनका बहना ज़रूरी है।।

10. हवस की गिरफ्त में है हर एक शक्श यहाँ,
      कोई मोहबबत का,कोई शौहरत का।
      कोई बदन का,तो कोई नाम का.
      इनके बीच एक इंसान कहाँ पाओगे।।

11. जिंदगी भर भागते रहे खुशिओं की तलाश में।
      खुशियाँ मिली तो अब जीवन हाँथ से निकला जाता है।।

12. प्यार का इज़हार करना हमें नही आता है।
      यूँ तो प्यार इजहारे वफ़ा होता है।।

13. नफरत इस कदर पाई है हमने।
      के अब नफरत से अब प्यार हुआ जाता है।।

14. सदियों में नहीं लम्हों में जिया करते हैं।
      हम तो हर गम को ख़ुशी से पिया करते हैं।।

15. कभी खुद के कभी गैरों के सितम झेलें हैं।
      हम कल भी तनहा थे,हम आज भी अकेले हैं ।।

16. जिंदगी भर बहाए हमने गैरों के लिए आंसू।
      आज दो आँसूं भी नहीं अपनों के लिए।।

17. वक्त्त नहीं हैं यहाँ सुनने को दस्ताने गम।
      खुशिओं की फिकर यहाँ कौन भला करता है ।।

18. ये बात किसी किताब में लिखी नहीं होगी।
      अंगद ने जब पाँव जमीं पे रखा होगा,धरतीमां से इज़ाज़त मांग ली होगी।।

19. तेरा अंदाज़े बयां दुनिया से जुदा सा है। 
      तू दिखता इन्सान सा है, लगता खुदा सा है।।

20. और कितना गिरेंगे,सियासतदान वतन के।
      लाशें भी गिन रहे हैं,तो टोपी देख के।।

21. अपनों को अपना बनाने में दिल की ज़रुरत है। 
      गैरों को अपनाने में ये काम दिमाग बखूबी करता है।।

22. यही किस्मत है वतन की मेरे,इसको अक्सर जयचंद ही मिलते हैं।
      जब भी वक्त आता है एक साथ मिलके लड़ने का,एक दुसरे का सर ही कलम करते हैं।।

23. हम बेखुदी में भी तेरा नाम नहीं भूले।
      तुम होशो हवास में हमारा नाम भुला बैठे।।

24. किस किस मोड़ पे तनहा करेगी हमें जिंदगी।
      ढूंड रहे हैं आज इस मोड़ पर हम अपने ही साये को।।  


धन्यवाद,
अरुण कुमार तिवारी 

Sunday, August 11, 2013

कुछ मुक्तक कुछ शेर {भाग पांच (V)}


कुछ मुक्तक कुछ शेर {भाग पांच (V)}
अरुण कुमार तिवारी 

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23. हाँथ में तलवार उठाने का हुनर क्या छोड़ा।
     "बीच वालों" की जमात सा हाल कर दिया ज़माने ने।।

1. मुश्किल दौर में से वो शेर बन के निकला।
    उसे ज़माना पलकों पे न बिठाता,तो और क्या करता।।

2. चोट लगी है दिल पे उसको, इतना तो है यारों।
     पर जितना चिल्ला रहा है, उतना ज़ख़्मी नहीं है यारों।।

3. अगर ज़िद पे आ जाये तो दरिया का मुह मोड़ सकता है आदमी ।
     इतना कमज़ोर है की आंसूओं में अक्सर बह जाता है इन्सान ।।

4. कुछ छुपा था धुंद में,कुछ छुपा था राख में।
    धुंद तेरी शहादत छुपा रही थी,राख जवानी तेरी।।

5. चूडिया बहुत बिक रही हैं बाज़ारों में।
     लगता है कोई मंदिर टूटा है अभी।।

6. बस यही इल्तजा है मेरी लाशें न गिनो।
    गिनो तो सर गिनो जो कटने को तैयार हैं माँ के वास्ते।।

7. या तो सच जानिए और उसके साथ हो लीजीए।
    या तो फिर झूठ को चाट के उसके सौदागर हो जाइये।।

8.   दे रहा हूँ तुझे दिल अपना।
      जीतेजी तुझे मरने नहीं दूंगा।।

9    आजकल बाज़ारे नफरत गर्म है। 
      लगता है मौसमे चुनाव नज़दीक है।।

10. इमान छोटे लेके,इन्सान बड़े नहीं बनते।
       देना पड़ता है इम्तेहान हर मोड़ पर,
       इतनी आसानी से लॊग महान नहीं बनते।। 

11. बदल गए हैं माप दंड इज्ज़त के कभी सर की पगड़ी बताती थी।
       आज सर पे रखा इनाम कीमत बताता है तेरी।।   

12. तकलीफ  ये नहीं था कि क्यूँ रोया मैं । 
      दर्द था ईमानदारी से पोंछे नहीं अपनों ने आंसू मेरे ।।

13. फिर नोट बंट रहे है फिर चूडियाँ बिक रही हैं सियासत के गलियारों में।
       लगता है शरहद पे कोई लाल शहीद हुआ है यारों।।

14. कमबख्त शहर भी कितना नासुकरा है।
      जब भी इबादत "इन्कलाब" देखता है,वहशियत "इश्क" में डूब जाता है यारों।।

15. मुकम्मल जहाँ पाने को बस फैलानी थी बाहें अपनी।
      ताउम्र इंतजार करते रहे सहारे किसी और के।। 

16. अंतर तो है उसकी और मेरी इबाददत का।
      मेरी दिल में ,उसके दिमाग में खुदा रहता है।।

17. बदल के मुझको नफरत करना चाहते हो तुम।
      बदल के मै तो मोहब्बत भी नहीं करता यारों ।।

18. वाह री किस्मत दरोदीवार बनति जिनके खून पसीने से।
      वही बुज़ुर्ग अक्सर, मर जाते हैं घर के बहार ठंडी से सिकुड़ के।।

19. ये सियासी लोग हैं यारों,मोल लगा देते हैं उस सर का भी।
      जिसके दर पे झुकाते है अक्सर सर अपना।।

20. जिस रात शैतान मेरे दिल से हिज्र कर गया।
      उस रात खुदा मेरे लिए हज पे चला गया।।

21. आप जरूर मांगिये जिन्दगी से मोहलत।
       जिन्दगी जब आप से जीने का मतलब पूंछे ईमानदारी दिखा देना हुज़ूर।।

22. आइना देख के चलना सीख लीजिये।
       तकलीफ तो होगी ,शर्मिंदगी नहीं होगी।।

धन्यवाद,
अरुण कुमार तिवारी