Thursday, May 30, 2013

वो बदसूरत लड़की


वो  बदसूरत  लड़की 
(अरुण कुमार तिवारी)

अक्सर सुबह सुबह वो बदसूरत सी,गंदे कपडे वाली लड़की जिसकी उम्र लगभग दस से बारह साल होगी दरवाज़ा खटखटाती और बीवी उसे आने देती।वो आके कभी गाड़ी साफ़ करती,कभी लॉन।कपडे और बर्तन शायद उससे  इस लिए साफ़ नहीं कराये जाते थे की कहीं जो नौकर परमानेंट है नौकरी न छोड़ दे।

       कभी वो मेरी बेटी के साथ खेलती कभी छोटे बेटे को खिलाती।बीवी का शायद कुछ बोझ हल्का होता था इस लिए वो उससे नहीं रोकती थी।वो जिस दिन भी काम करती दस रुपये ले जाती थी।ऐसा शायद वो और भी कई घरों में करती थी।

       यूँ तो मैं देर से ही उठता था।पर जब कभी भी जल्दी उठता तो सुबह सुबह उसका बदसूरत चेहरा देख कर गुस्सा आ जाता,कई बार उससे डांट भी देता वो ठिठक के कोने में हो जाती।

       कई बार बीवी से झगडा भी हुआ कि क्यूँ वो उससे बुला लेती है,क्यूँ बच्चों को उसके साथ खेलने देती है,बच्चे क्या संस्कार सीखेंगे।दस रुपये में काम करने वाली मिल गई है तो क्या बच्चों को बर्बाद कर दें।बीवी ने कहा वो दस से ज्यादा लेती ही नहीं,अगर जादा देर रूकती है तो कभी बच्चों के पुराने कपडे मांग लेती है,कभी दूध।तब मैंने बीवी को समझाया इससे बिज़नस कहते हैं,या फिर हो सकता है ये शातिर हो कोई चोरी की भी नियत रखने वाली हो सकती है,धयान देना किसी दिन कोई लम्बा हाँथ मारेगी।अक्सर उस को लेके नोक झोंक होती रहती थी।

    एक दिन पडोस के घर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी।जाके देखा तो पडोसन उस लड़की को मार रही थी  लड़की सहमी सी खड़ी थी ,शायद उसने  मेज़ पर पड़े उसके शराबी पति के पर्स से कुछ पैसे चुरा लिए थे।धीरे धीरे और भी पडोसी इकठ्ठा हो गए,कुछने सलाह दी उसे पुलिस को दे दिया जाये।इस बीच मौका देख के वो भाग गई।घर पर आके मैंने बीवी को डांट लगाई "तुम ने भी उससे बहुत घर में घुसा रखा था देखो कहीं हमारे घर में भी हाँथ साफ़ करके न गई हो"

    समय गुज़रता गया और हम सब ये बात भूल गए।एक दिन बाज़ार जाते समय एक लोहार की दुकान पे धयान गया वहां एक लड़की फूंकनी से हवा कर रही थी।धयान से देखा तो ये वही लड़की थी,पडोसी होने का फ़र्ज़ जाग गया,सोचा आज इससे पकड़ के पुलिस के हवाले कर ही दूं।जब तक गाड़ी पार्क की और उस दूकान तक पहुंचा वो लड़की वहां से जा चुकी थी।मैंने लोहार से उसके बारे में पूंछा तो उसने  कहा वो उसके बारे में तो ज्यादा नहीं जानता बस यही की उसके मा बाप छह सात महीने पहले मजदूरी करते वक्त मकान के निचे दबने से मर जाये थे,और आज कल रोज वो लड़की उसके पास काम करने आती है दिन का पचास रूपया देता था वो उसे,जब बहुत पूंछा तो उसने कहा "यहाँ से आधा किलोमीटर दूर नाले के पास कुछ पुरानी सीवर की पाइप पड़ी हैं शायद वहीँ कहीं रहती है"।जिद्द थी शायद इस लिए मैं उस ओर चल दिया जहाँ मैं कभी शायद सपनो में भी नहीं जाना पसंद करता।

       जब वहां पहुंचा तो एक पाइप जिसकी गोलाई लगभग तीन फिट लम्बाई चार से पांच फिट होगी उसमें एक डेढ़ साल का बच्चा रोता दिखा,उसने जो कपडे पहने थे उससे मैं पहचान गया क्यूंकि ये वही कपडे थे जो मेरी बीवी से ज्यादा काम करने के एवज में वो लेती थी।पास ही इंटों के बने चूल्हे पे वो लड़की दूध गरम कर रही थी।उसने दूध बनाया,बच्चे को गोदी में लेकर दूध पिलाने लगी।जब बच्चे ने दूध पी लिया तो उससे कंधे पर सहलाया कुछ देर में बच्चा सो गया,उसने बच्चे को कपडे के बने झूले पे लिटा दिया।कोने में पड़ी टूटी सुराही से पानी पिया और फिर बढ़ चली चूल्हे की तरफ,एक कपडा लिया और हाँथ के छाले सेंकने लगी।

    इस वक्त तक मेरी हाँथ पाँव सुन्न हो चुके थे,शर्मिंदगी का भाव जो आँखों से निकल रहे थे रोके नहीं रुक रहे थे।वो बदसूरत लड़की आज देवी सी नजर आ रही थी।अगर भगवान भी आके उसे चॊर कहता तो उससे भी लड़ जाता,खुद्दार चोर नहीं होते।न जाने कितनी शर्मिंदगी थी की होश में न रहा ,होश आया तब जब उसके नन्हे हांथों ने हिलाया शायद वो मुझे पहचान गई थी उसने बस इतना कहा "बाबूजी मैंने चोरी नहीं की थी"

   मैं वापस मूड चला पर इस बार मेरी गोद में एक देवी थी एक बच्चा था,मैं उन्हें गोद में लिए लिए वैसा ही महसूस कर रहा था जैसा लोग नवरात्री में देवी आपने घर लाते हैं।मैं जानता था मैं वो संस्कार ला रहा हूँ जो मैं चाह कर भी आपने बच्चों में नहीं डाल पाता।           

धन्यवाद् 
अरुण कुमार तिवारी
      

2 comments:

  1. श्रीमन वाकई बहुत सुन्दर दिल को छू लेने वाली कहानी है , अंत मार्मिक एवं तार्किक परिणित वाला है . इसे अपनी फेसबुक अकाउंट में शेअर और उसके ग्रुप्स में डाल रहा हूँ . धन्यवाद आपका .
    क्या आप गूगल हिंदी ट्रांसलिटरेशन डाउनलोड कर हिंदी के प्रचार-प्रसार में मेरे सहयोगी बनना पसंद करेंगे ???

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  2. धन्यवाद् ,जरूर श्रीमान

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